युद्ध के परिणाम पर शोक प्रकट करना
भगवद्गीता का उपदेश एक ही वंश के दो चचेरे भाइयों कौरव और पाण्डवों के मध्य हुए महाभारत युद्ध की रणभूमि …
विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग
इस अध्याय में अर्जुन अपने सम्मुख उत्पन्न स्थिति का सामना करने में अपनी असमर्थता को पुनः प्रकट करता है और …
कर्म का विज्ञान
इस अध्याय में श्रीकृष्ण यह समझाते हैं कि सभी जीव अपनी स्वाभाविक प्रकृति के गुणों के कारण कार्य करने के …
ज्ञान का योग और कर्म करने का विज्ञान
चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को दिए जा रहे दिव्य ज्ञान के उद्गम को प्रकट करते हुए उसके विश्वास को …
वैराग्य का योग
इस अध्याय में कर्म संन्यास के मार्ग की तुलना कर्मयोग के मार्ग के साथ की गयी है। श्रीकृष्ण बताते हैं …
ध्यान का योग
श्रीकृष्ण कर्मयोग और कर्म संन्यास के तुलनात्मक विवेचन को छठे अध्याय में भी जारी रखते हैं और कर्मयोग की संस्तुति …
दिव्य ज्ञान की अनुभूति द्वारा प्राप्त योग
यह अध्याय भगवान की शक्तियों के भौतिक और आध्यात्मिक आयामों के वर्णन के साथ आरम्भ होता है। श्रीकृष्ण व्यक्त करते …
अविनाशी भगवान का योग
यह अध्याय संक्षेप में कुछ महत्वपूर्ण अवधारणाओं का वर्णन करता है जिनका उपनिषदों में विस्तार से उल्लेख किया गया है। …
राज विद्या द्वारा योग
सातवें और आठवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने भक्ति को भगवत्प्राप्ति का सरल साधन और योग की सर्वोच्च स्थिति बताया …
भगवान के अनन्त वैभवों की स्तुति द्वारा प्राप्त योग
इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अपनी महिमा का वर्णन किया है जिससे अर्जुन को भगवान में ध्यान केन्द्रित करने में …
भगवान के विराट रूप के दर्शन का योग
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन की भक्ति को पोषित करने के लिए अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन किया था। …
भक्ति का विज्ञान
इस अध्याय में के अन्य मार्गों की अपेक्षा भक्ति मार्ग की सर्वोत्कृष्टता पर प्रकाश डाला गया है। इसका प्रारम्भ अर्जुन …
योग द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभेद को जानना
भगवद्गीता में कुल अठारह अध्याय हैं। इनका तीन खण्डों में विभाजन किया जा सकता है। प्रथम खण्ड के छः अध्यायों …
त्रिगुणों के ज्ञान का योग
पिछले अध्याय में आत्मा और शरीर के बीच के अन्तर को विस्तार से समझाया गया था। इस अध्याय में माया …
सर्वोच्च दिव्य स्वरूप योग
पिछले अध्याय में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया था कि माया के तीन गुणों से रहित होकर ही जीव अपने दिव्य …
दैवीय और आसुरी प्रकृति में भेद का योग
इस अध्याय में श्रीकृष्ण दैवीय और आसुरी दो प्रकार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। दैवीय गुण धार्मिक ग्रंथों के …
श्रद्धा के तीन विभागों के ज्ञान का योग
चौदहवें अध्याय में श्रीकष्ण ने माया के तीन गुणों की व्याख्या की थी और यह भी समझाया था कि किस …
संन्यास में पूर्णता और शरणागति का योग
भगवद्गीता का अंतिम अध्याय सबसे बड़ा है और इसमें कई विषयों को सम्मिलित किया गया है। अर्जुन संन्यास और त्याग …
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